राजा भर्तृहरि भारत के प्रसिद्द सम्राट विक्रमादित्य के बड़े भाई थे. लोककथाओं के अनुसार राजा भर्तृहरि को अमरफल की प्राप्ति हुई थी जिसे खाकर वह अमर हो जाते परन्तु उन्होंने वह अमरफल ना खाया और वह सन्यासी हो गए.
राजा भर्तृहरि विषय में बहुत सारी अलग अलग किवदंती सुनने मिलती है. राजा भर्तृहरि का उल्लेख हिन्दू साहित्य के साथ जैन साहित्य में भी किया गया है. दोनों साहित्य में भर्तृहरि की कथा में थोड़ा बहुत अंतर है.
https://mp.ucweb.com
हिन्दू साहित्यकारों के अनुसार राजा भर्तृहरि की एक रानी थी जिसका नाम पिंगला था. दोनों एक दुसरें से बहुत प्रेम करते थे. एक बार राजा भर्तृहरि शिकार करने के लिए वन में जाते है परन्तु मार्ग में उनको परेशानीयों का सामना करना पड़ता है. उनको अपने राज्य में लौटने में विलंब हो जाता है. यहां उनकी रानी पिंगला को यह खबर मिलती है की राजा भर्तृहरि की मार्ग में मृत्यु हो गई है. यह खबर सुनते है पिंगला अपने प्राण त्याग देती है.
http://www.rudraksham.com
जब राजा भर्तृहरि अपने राज्य में वापस लौटता है तो वह अपनी रानी को मरा हुआ पाता है. इस कारण के वह बहुत दुखी हो जाता है. उस समय उसके राज्य में महान योगी गोरखनाथ आए हुए थे. जिन्हें शिवजी का अवतार भी कहा जाता है. राजा भर्तृहरि गोरखनाथ से अपनी रानी को जीवित करने के लिए विनती की. तब गोरखनाथ ने राजा भर्तृहरि से यह शर्त रख दी कि समय आने पर भर्तृहरि को उनका शिष्य बनना पडेगा.
गोरखनाथ ने राजा की विनती मानकर पिंगला के शरीर में एक गणिका की आत्मा का प्रवेश करा दिया. इस तरह वह रानी तो जीवित हो गई पर उसमे अब आत्मा एक गणिका की थी. उसके बाद गोरखनाथ वहां से चले गए. राजा भर्तृहरि अब पिंगला के शरीर में रह रही उस गणिका ही अपनी पत्नी मानकर जीवन व्यतीत करने लगे.
अब जो रानी के शरीर में रह रही पिंगला थी वह पतिव्रता नहीं थी. उसको एक महावत से प्रेम हो जाता है. वह राजा भर्तृहरि के साथ वफादार नहीं रह पाती. उस महावत को भी एक नृत्यांगना से प्रेम होता है. गुरु गोरखनाथ को ही यह सारा भेद ज्ञात होता है. इसलिए समय आने पर वह एक साधू के हाथों राजा भर्तृहरि को अमरफल भेजते है जिसे खाने से मनुष्य अमर हो जाता है.
भर्तृहरि यह अमरफल अपनी रानी को इसलिए देता है कि वह हमेशां के लिए सुंदर और जवान रह सके. रानी यह फल अपने प्रेमी महावत को देती है और वह महावत यह फल अपनी प्रेमिका नृत्यांगना को देता है. नृत्यांगना यह सोचती है कि वह इस अमरफल के लायक नहीं है. इस फल को तो भर्तृहरि जैसे दयावान न्यायप्रिय राजा के पास रहना चाहिए. इसलिए नृत्यांगना वह फल राजा भर्तृहरि को उपहार के तौर पर देती है.
यह अमरफल घूम फिर पुनः अपने पास आया देख राजा भर्तृहरि को अब सारी बात समझ में आ गई. राजा के पूछने पर उस नृत्यांगना ने बता दिया कि वह फल उस महावत ने दिया है और महावत से पूछने पर उसे अपनी रानी की बेवफाई का पता चला.
maheshparmar400.files.wordpress.com
इसके बाद राजा भर्तृहरि को संसार से वैराग्य उत्पन्न हो गया. वह संसार त्याग कर सन्यासी बन गए और वह अपने वचन के अनुसार गुरु गोरखनाथ के शिष्य बन गए.





0 comments:
Post a Comment